Thursday, September 22, 2016

I try with every finished work to breathe life into a long forgotten culture so that it's designs,ideas, innovations and lifestyle are displayed on my canvas 

Wednesday, September 14, 2016

देवनागरी

सूरज की प्रथम किरन सी
मंदिर के घंटों की धुन सी
वेला की ख़ुशबू जैसी
तन मन में तू उतर रही
हे देवनागरी  !

सोंधी सोंधी माटी सी
व्यार में तू घुल रही
चंदन की ठंडक जैसी
मन मंदिर में उतर रही
हे देवनागरी  !

कण कण में तेरी थाती
सबसे सुंदर तेरी बाती
सितार की झंकार जैसी
रोम रोम में उतर रही
हे देवनागरी !

वर्ण वर्ण सी जब तू बढ़ती
नई ईबारत नित तू लिखती
अविष्कार की जननी जैसी
विश्व पटल पर उतर रही
हे देवनागरी  !
(कापी राईट सुरक्षित)
 वंदना सिंह
१२/९/१६


Monday, September 12, 2016

हिन्दी

प्रगति वही देश है करता
जिसकी अपनी भाषा हो
दूजे की भाषा अपनाकर
क्या स्वाभिमान की आशा हो

हिन्दी के बढ़ते क़दमों से
आज ब्रह्माण्ड स्तब्ध है
अंग्रेज़ी जर्मन व चीनी
सबकी नजर हिन्दी पर है

आओ इसके प्रगति रथ को
हम मज़बूत बनाते हैं
हिन्दी बोल व लिखकर के
विजय यात्रा बढ़ाते हैं
( कापी राईट सुरक्षित )
    वंदना सिंह

Saturday, September 10, 2016

गर मारा न होता

रोका था कभी तुममें मुझे इस भूलोक पर आनें से
आ भी गई ज़बरन तो लगे पीछा छुड़ाने तुम
हिम्मत दिखा कर गर तुमनें आगे बढ़ाया होता
तो शायद आज जग में तुम्हारा नाम भी होता
( कापी राईट सुरक्षित)
वंदना सिंह

Wednesday, August 17, 2016

ऐसा देश हो मेरा

केसरिया   हो  जोश   अंग में
खेत   खेत    हरियाली   हो ,
सुजलां सफलां मेक इन इंडिया
डिजीटल  गांव में  लाली हो ।
गाँव शहर हों एक समान
न उनमें कोई वाली हो
न रावण न मेघनाद
बस राम नाम की लाली हो
(साभार ....)

Wednesday, April 20, 2016

डाइनामाइट

संसद में जूते चलते या जब होती हाथापाई
हाय री किस्मत तूनें ये कैसी तस्वीर दिखाई
ये देश है वीर भगत का,आजाद और गाँधी का
उन रस्मों का,कस्मों का,और है उनके सपनों का
जिसनें सब कुछ बार दिया,तब आजादी पाई
हाय री किस्मत--------
याद करो उस हमले को जब संसद थर्राई
सारे सांसद भाग गये,तब संतोष सामनें आई
एेसे बुजदिल नेताओं की नारी नें जान बचाई
हाय री किस्मत ---------
जेलें भरी पड़ीं हैं आतंकी हमलावारों से
कोई रियायत नहीं करो,तुम एेसे गद्दारों से
एक डाइनामाइट से कर दो उनकी विदाई
हाय री किस्मत-----------
संसद में जूते चलते या जब होती हाथापाई
हाय री किस्मत तूने ,ये कैसी तस्वीर दिखाई।

वंदना सिंह
(कापी राईट सुरक्षित)

Tuesday, April 19, 2016

सपना

सुखी जीवन की कल्पना हर इंसान करता है
मैंनें भी की इसमें कुछ नया नहीं है
पर कल्पना के पंख पर बैठ कर
मैं जब उड़ रही थी,सपनें बुन रही थी
सपनों की पतंग ऊँची थी,डोर कच्ची थी
पता न चला कब टूट गई,मैं उठ कर बैठ गई ।

                     वंदना सिंह
      (कापी राईट सुरक्षित )